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मनरेगा का मन कहीं और-Narega ka man kahi or

Posted On: 17 Jun, 2011 Others में

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मनरेगा में सरकार का कितना प्रतिशत मन है या नही यह साफ दिख रहा है. इस योजना को चलाने वाले लोग और इस योजना को बनाने वाले लोग दोनो ही इसे दीमक की तरह चूस रहे है. 100 दिन का रोजगार तो दूर, बहुत जगह देखा गया है कि इस योजना के बारे में लोगों को सही जानकारी तक नहीं दी गई और जो भी जानकारी दी गई है वह पूर्ण नहीं है. सरकार ने जब मनरेगा का कानून बनाया था तो उस समय इसका काफी प्रचार प्रसार हुआ था. कांग्रेस इसे अब तक का सबसे बड़ा काम बताती है और आज भी चुनावों के समय मनरेगा को एक बड़े मुद्दे के रुप में लोगों के सामने लेकर आती है. लेकिन वास्तविकता तो यह है कि यह चुनावों तक ही सीमित है पूरे साल सरकार इस पर नीतिगत विचार करने की वजाय इस पर चर्चा तक नहीं करती. इस कानुन को आए हुए 5 साल हो गए है लेकिन सरकार ने इस पर बैठकर पांच बार विचार तक नहीं किया. अगर किया होता इतनी बड़ी संख्या में पलायन की नौबन तक नही आती. आज मनरेगा को भी भ्रष्टाचार के दिमक ने जकड़ लिया है जो लाभ किसानों और मजदूरों को पहुंचना चाहिए वह लाभ सरकार और सरकार के नुमाइंदों को मिला रहा है. अगर आम जनता के दृष्टिकोण से देखे तो मनरेगा में बहुत तरह की सुधार की जरुरत है लेकिन लगता है कि सरकार इस पर गंभीर दिखाई नहीं देती.


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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

शिवेंद्र मोहन सिंह के द्वारा
July 19, 2011

शक्ति सिंह जी आज सुबह मेरा चिंतन इसके नाम पर चल रहा था की ये मनरेगा है या “मन… रे .. गा”. बनाने वाले और चलने वाले दोनों ही फल फूल रहे हैं. इनके मन मुन्नी और शीला की तरह नाच और गा रहे हैं. तो इसका नाम मनरेगा की बजाए “मन… रे… गा” ही होना चाहिए.

newrajkamal के द्वारा
June 21, 2011

प्रिय शक्ति सिंह जी …..नमस्कार ! आप का यह छोटा सा लेख सिक्के के दोनों पहलुओ पर रौशनी नहीं डालता है ….. हमारे पंजाब में इसी मनरेगा कि किरपा से लेबर कि काफी कमी हो गई है ….. धन्यवाद

Harish Bhatt के द्वारा
June 18, 2011

शक्ति जी नमसेटी. आपने सही कहा की मनरेगा में बहुत तरह की सुधार की जरुरत है लेकिन लगता है कि सरकार इस पर गंभीर दिखाई नहीं देती.

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
June 18, 2011

शक्ति सिंह जी अब तो यह हमारी सरकार का धर्म बन गया है कमा के लाने वाले चढावा चढ़ने वालों की बल्ले बल्ले -हाथ का अंगूठा और हस्ताक्षर हो जायेगा पैसा बंट जायेंगा कागज़ पूरे होने से मतलब बस धन खर्च हो चाहे जहाँ चला जाये निम्न सटीक कहा आप ने रक्त चूस — इस योजना को चलाने वाले लोग और इस योजना को बनाने वाले लोग दोनो ही इसे दीमक की तरह चूस रहे है. 100 दिन का रोजगार तो दूर, बहुत जगह देखा गया है कि इस योजना के बारे में लोगों को सही जानकारी तक नहीं दी गई और जो भी जानकारी दी गई है वह पूर्ण नहीं है


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