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अरे भइया यह कैसी टोपी है!

Posted On: 23 Sep, 2011 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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Topiगुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी  ने अपने उपवास में मुस्लिम समुदाय द्वारा दी गई टोपी को स्वीकार न करके एक अलग तरह का मुद्दा छेड़ दिया है, जिसका फायदा राजनीतिक रूप से कांग्रेस और दूसरे राजनीति दल उठाना चाहेंगे.


मई के मध्य और आखिरी दिनों में एक टोपी ऐसी भी थी जिसने पूरे देशभर में अपने जलवे बिखेरकर बच्चे, बूढ़े, और जवानों को अपनी ओर आकर्षित किया. उस टोपी का नाम था अन्ना की टोपी. जिस गांधी की टोपी को पहनना युवाओं के लिए शर्म की बात होती थी वही युवा इसे पहनकर गर्व महसूस करने लगे थे. इस टोपी ने सभी धर्म, जाति और वर्ग के बेड़ियों को तोड़ दिया और एक आवाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ नासूर बनकर सामने आई. यह टोपी भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के लिए कफन थी जिसका सामना करने के लिए उनमें हिम्मत नहीं थी.


एक साधारण सी दिखने वाली टोपी का जादू पहले कभी देखने को नहीं मिला. इसने कुछ ही दिनों में ही सम्मान और मुकाम हासिल कर लिया. इसे पहनकर लोगों ने उन सभी पापी राजनीति करने वाले नेताओं को बता दिया कि यदि देश की व्यवस्था को खतरा हो तो हम सब एक साथ हैं.


ऐसे में सवाल उठता है कि मोदी को दी जाने वाली टोपी में ऐसा क्या था जिसे मोदी ने अपनाने से इंकार कर दिया. क्या उस टोपी से धर्म की बू आ रही थी. क्या उस टोपी के बहाने राजनीति नफा-नुकसान को देखा जा रहा था या फिर उस टोपी के बहाने मोदी की सोच को परखा जा रहा था कि वह दूसरे धर्म को लेकर कैसा सोच विचार रखते हैं. एक ओर अन्ना की टोपी ने पूरे देश और भारतीय समाज को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय द्वारा दी गई टोपी ने एक व्यक्ति को बांधने में कामयाबी हासिल नहीं की. अरे भइया यह किस तरह की टोपी है ?




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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bharodiya के द्वारा
September 24, 2011

शक्तिसिंहभाई नमस्कार टोपी पेहनाने के लिये छाती चाहिए । बापू और अन्ना दोनोने छाती टोक के टोपी पेहनाई थी । बापू ने तो ऐसी पेहनाई थी की वो हमारा रोजमर्रा का पोशाक बन गया था । हमे नही मालुम था वो गांधी-टोपी थी, हम तो उसे खादी की टोपी केहते थे और रोज पेहनते थे । वो तो देवानंद, रजेश खन्ना, डेनी और अमिताभ बच्चन ने उतरवा दी वरना आज भी पेहनते । अन्ना की टोपी को तो आप जान ते है दो दिनमे उतर गई । नेता को तो छाती ही नही होती वो क्या ठोक के पेहनाएगा । कोशीश जरूर करता है अपने झुठे वादों की टोपी पेहनाने का । लेकिन जनता अब होसियार हो गई है, पेहले जैसी बेवकुफ नही जो कोई भी ऐरे गैरे की टोपी पेहन ले । अब टोपी पेहनाना आसान नही है, साहब । ये मन्त्र जरूर मोदी ने मुज से सीखा है । मोदीने बता दिया की वो तुष्टिकरण की टोपी नही पेहनता नही पेहनाता । हिन्दु की पगडी पेहनी वो मेरा निजी मामला है क्यों की मै राज नेता से पेहले हिन्दु हुं । धर्म की टोपी अपने ही लोगों की निजी टोपी है उसे दूसरों को नही पेहनानी चाहिये । यदि आप ईसे हिन्दु का तुष्टिकरण समजते हो तो वो आपकी मुर्खामी है और मेरे पास मुर्खों से बात करने का समय नही है ।

suman dubey के द्वारा
September 24, 2011

शक्ति जी नमस्कार्। टोपी तो ठीक है पर उसके पीछे होने वाली राजनीति का कुछ पता नही ।शक्ति जी आप मेरे ब्लाग आएं देखे खिलाएगें तुमको विरयानी——

nishamittal के द्वारा
September 24, 2011

टोपी देने वाले की नियत तो देखिये पहले.

    shaktisingh के द्वारा
    September 24, 2011

    प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, 

manoranjanthakur के द्वारा
September 24, 2011

टोपी महात्म के क्या कहने साध साध

Santosh Kumar के द्वारा
September 23, 2011

श्री शक्ति सिंह जी ,.नमस्कार यह बात तो स्पष्ट है कि राजनीतिक टोपियाँ दौड़ रहीं हैं ,..मोदी ने टोपी से क्यों इनकार किया इसके कई कारण हो सकते हैं ,..लेकिन उससे पहले यह सवाल है कि टोपी दिया क्यों ?..

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 23, 2011

अरे भाई हमसे क्यों पूछते हो ? खुद ही क्यों नहीं बता देते …. औरतो के मन की और इन नेता लोगों के मन की हम क्या जाने ? :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/09/18/“जब-जागरण-गांव-की-सभी-शादी/

akraktale के द्वारा
September 23, 2011

शक्तिजी सिर पर टोपी, सिर का ताज होती है , कोई फूलों का तो कोई काँटो का.  अब आपको समझ ही  गया होगा कौनसी टोपी कैसी थी. फिर इस बात को आप समझ लें हम काँधे तक तो सह लेते हैं किंतु सिर पर नहीं. यह मानव स्वभाव है या कहें शरीर की बनावट.

    shaktisingh के द्वारा
    September 24, 2011

    आपने जो विचार दिया वह पढ़ कर अच्छा लगा


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