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खेल पस्त खिलाड़ी मस्त

Posted On: 7 Oct, 2011 sports mail में

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partyक्रिकेट का रंग हर वर्ग के लोगों में देखा जा सकता है. क्रिकेट के लिए लोगों का पागलपन उसके प्रति विश्वास को दर्शाता है. भारत जैसे देश में क्रिकेट एक धर्म है जिसकी पूजा हर उम्र के लोग करते हैं. खिलाड़ियों के प्रति स्नेह, उनको अपना आदर्श मानना भारत के युवाओं के चेहरे पर साफ झलकता है. लेकिन क्या यह खिलाड़ी अपने इन्ही क्रिकेट भक्तों के विश्वास को कायम रख पा रहे हैं. उनके अन्दर वह खुशी, विश्वास, देशप्रेम की भावना जगा पा रहे हैं.


खिलाड़यों ने खेल को नहीं बल्कि ऐशो-अराम की जिन्दगी अपने जीवन का लक्ष्य बना रखा है. वे इसमें ही अपने भविष्य को तलाश रहे हैं. कुछ दशक पहले भारत में ऐसे भी खिलाड़ी हुआ करते थे जो खेल में मेहनत को तवज्जो देते थे. खिलाड़ी जब स्टेडियम में पहुंचते थे तो वह अपने बॉडी को वार्म-अप करते जोश के साथ मैदान पर पहुंचते थे. वह अपने आप को फिट रखने के लिए नियमित रूप से व्यायाम तो करते ही थे साथ-साथ अपने रोजाना के डाइट से कभी नहीं भटकते थे. इस तरह की लगन, जोश तथा मेहनत आज के खिलाड़ियों में कम देखने को मिलती है. मेहनत तो दूर वह खुद के बैट और पैड किट को भी नहीं उठाते. वह मैदान में पहुंचने के लिए लग्जरी गाड़ियों का सहारा लेते हैं. क्रिक़ेट में ज्यादा पैसा और चमक-दमक होने की वजह से इन खिलाड़ियों ने अपने सेहत पर भी ध्यान देना छोड़ दिया है. खाली समय में उनका अंतिम स्थान स्टेडियम न होकर बार और पब हो चुके हैं.


जहां पहले के खिलाड़ी अपने कॅरियर को प्रदर्शन के बदौलत ऊंचाइयों पर ले कर जाते थे. एक-दो साल के लिए नहीं बल्कि आठ-दस साल तक अपने क्रिकेट टीम को सेवा देते थे. लेकिन आज के खिलाड़ियों में वह दम खम नहीं दिखता. अपने कॅरियर के शुरुआती दौर में वे बेहतर प्रदर्शन तो करते है. लेकिन कुछ समय बीतने के बाद उसे लम्बे कॅरियर के रूप परिवर्तित नहीं कर पाते. खराब प्रदर्शन ने उन्हें टीम से कई बार अंदर बाहर किया है. उनमें पहले जैसे खिलाड़ियों की तरह वह जज्बा नहीं दिखता जिससे वह अपने आप को टीम के अंदर पक्का स्थान दे सकें.


इन खिलाड़ियों ने खेल की बजाय चकाचौंध की जिन्दगी को अपने रोजाना के टाइम-टेबल में शामिल कर लिया है. नियमित रूप से अपने आप को फिट न रखने की वजह से ये खिलाड़ी अपने जरूरी प्रदर्शन को भी सही रूप नहीं दे पाए. जब भी कोई बड़ी सीरीज शुरू होती है छोटे-बड़े सभी खिलाड़ी अपने आप को अनफिट घोषित करके सीरीज को बीच मझधार में छोड़कर चले जाते हैं. इनका ढुलमुल प्रदर्शन इन्हें और टीम को उपर से बिलकुल नीचे लेकर आ जाता है.


इन लोभी और लालची खिलाड़ियों ने जिस तरह आईपीएल और दूसरे टी-20 चैम्पियंस लीग को अपनी कमाई का जरिया बना रखा है वह क्रिकेट के बड़े रूपों जैसे टेस्ट मैच और वनडे दोनो को बिगाड़ने का काम कर रही है. अगर यही खिलाड़ी वक्त रहते अपने आप को सुधार नहीं पाए तो वह अपने कॅरियर पर ही कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे. इन खिलाड़ियों का क्रिकेट के प्रति अपने आप को समर्पित न कर पाना क्रिकेट भक्तों को धोखा देने जैसा है. तो क्या आप उम्मीद करते हैं कि पैसे के लालची और वासना के पुजारी आज के खिलाड़ी क्रिकेट की गरिमा को बरकरार रख सकेंगे?

अपनी राय जरूर दीजिएगा.

धन्यवाद.




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22 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lahar के द्वारा
October 21, 2011

शक्ति भाई सप्रेम नमस्कार पहले लोगों के अन्दर देशप्रेम की भावना होती थी लोग स्व इच्छा से खेलते थे और उन्हें खेल में आनंद आता था | परन्तु आज पैसा उन्हें खेलने के लिए मजबूर करता है | जिन खेलो में पैसो में नहीं है वह खिलाडी भी नहीं है | आज खेलो और खिलाडियों से ज्यादा महत्वपूर्ण पैसा हो गया है | आपने एक अच्छे मुद्दे पर अच्छा लेख लिखा है |

    shaktisingh के द्वारा
    October 21, 2011

    लहर जी, प्रतिक्रिया देने के लिए आपको धन्यवाद

syeds के द्वारा
October 12, 2011

शक्ति जी, अब यह खेल नहीं व्यवसाय है… http://syeds.jagranjunction.com

    shaktisingh के द्वारा
    October 21, 2011

    सैयद जी, राय देने के लिए आपको धन्यवाद

jlsingh के द्वारा
October 9, 2011

क्रिकेट को इतना अधिक महत्व देते हैं, हम सभी भारतीय क्रिकेट के दीवाने है और क्रिकेट प्लेएर पैसा और शोहरत के —————-. अगर हमलोग क्रिकेट देखना कम कर दें, प्रायोजन कम हो जायेगा और पैसा भी! तब इन खिलाड़ियों में चेतना आयेगी.

    shaktisingh के द्वारा
    October 10, 2011

    सिंह साहब, उपयोगी राय देने के लिए आपका धन्यवाद

abodhbaalak के द्वारा
October 9, 2011

भय्या का जरूरत है म्हणत करे की ……….. जेकर लिये खेलत रहे ओकर कमी अब नइखे न ? :) सुन्दर व्यंगा http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    shaktisingh के द्वारा
    October 10, 2011

    आबोध जी, प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद

Abdul Rashid के द्वारा
October 8, 2011

प्रिय शक्ति जी माया महा ठगिन हम जानी सब माया का खेल है भाई http://singrauli.jagranjunction.com

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    राशिद जी प्रतिक्रिया देने के लिए आपका शुक्रिया

vikasmehta के द्वारा
October 8, 2011

सकती सिंह जी ………अच्छे लेख के लिए बधाई …… आपका प्रशन उचित है…………….लालची और वासना के पुजारी आज के खिलाड़ी क्रिकेट की गरिमा को बरकरार रख सकेंगे? आज के खिलाड़ी एक अच्छा खेल खेलकर कह देते है उनकी पीठ में दर्द हैया फिर घुटनों में दर्द है या फिर कम्पनियों द्वारा उन्हें पैसे में लाड दिया जाता है जिसके कारण वह भारतीय जनमानस की भावनाओं को नही समझते और उनका लक्ष्य केवल पैसा कमाना ही रहता है

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    विकास जी लगता है कि आप भी मेरी तरह नाराज हैं

akraktale के द्वारा
October 8, 2011

शक्ति जी नमस्कार, आपने सही कहा ये खिलाडी जिनका चयन ही सिफारिश के बल पर हो रहा है,वो एक दो मैच में तो अच्छा खेल दिखा है सकते हैं. किन्तु बाकि वक्त उनके एक रन दो रन यही स्कोर रहेंगे.जैसे नेता के घर नेता पैदा हो रहे हैं वैसे ही क्रिकेटर के घर क्रिकेटर पैदा हो रहे हैं. पुरे देश में कभी प्रतिभाओं का चयन करने का कोई साफ़ तरीका है. सब सिफारिश. तो फिर पैसा कमाकर इनको एश तो करना ही है.

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    राय देने के लिए आपको मेरा धन्यवाद

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    क्षमा कीजिएगा रक्तले जी, आपका नाम लिखना भूल गया शक्ति सिंह

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 7, 2011

अरे शक्ति भाई …. नमस्कार इसमें इन बेचारों का भला क्या कसूर – सारा कसूर तो इस नामुराद दिल का ही है …..और रही सही कसर तब- जब कोई गोरी चमड़ी वाली कहती है- “आई वान्ट टी चिगी विगी विद यू ब्वाय” ईन टूर्नामेंटों का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव सिर्फ हमारे खिलाड़ियो पर ही पड़ता है जबकि इसमें सभी देशों के खिलाड़ी भाग लेते है ….. वैसे अब बोर्ड ने इसकी रोकथाम के लिए खिलाड़ियो को अपनी बीवी साथ में लाने की छूट दे दी है ….. भला होम मिनिस्टर कम ग्रह मंत्री के सामने रहते किसी विदेशी बाल की क्या मजाल ….?

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    राज कमल जी, आपके भी विचार काफी मजेदार है.

Santosh Kumar के द्वारा
October 7, 2011

प्रिय शक्ति जी ,.नमस्कार आप वाकई बहुत गुस्से में हैं ,..ठोकर लगने के बाद सुधार होता ही है,..इनमें भी…साभार

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    क्या करें संतोष जी, जिस खेल के लिए हम अपने किमती समय को देते हैं वही खेल हमें सही तरह से परोस कर ना मिले तो पीड़ा जरूर होती है.

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 8, 2011

    प्रिय शक्ति जी ,.नमस्कार अब सब जगह पैंसों का ही खेल हो रहा है ,…तो ये भी खेल रहे हैं ,…कुसूर हमारा भी है ,..हाकी की उपलब्धियां भूल गए हम ,..अभी चीन में एशिया कप जीते हैं ,….किसी चैनल पर मैच देखने को नहीं मिला,….स्टार बना जुगराज झुग्गी में रहता है ,..उसके घर में बिजली तक नहीं थी ,…जब हीरो बन गया तो सरकार ने बिना पैसे लिए तार जोड़ दी ,… http://santo1979.jagranjunction.com/

    shaktisingh के द्वारा
    October 8, 2011

    जब इन क्रिकेट खिलाड़ियों को बेशुमार पैसा मिल रहा है तो वह बेहतर प्रदर्शन क्यों नहीं कर रहे

    Santosh Kumar के द्वारा
    October 8, 2011

    पैसा प्रदर्शन का आधार नहीं हो सकता ( मेरी अपनी राय है ) शायद आप नहीं भी सहमत हों ..


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