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बूढ़ी हो गई भारतीय तिकड़ी

Posted On: 6 Jan, 2012 sports mail में

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sachin dravid and laxmanभारतीय क्रिकेट की यह तिकड़ी, इन तिकड़ी पर भारतीय दर्शकों को नाज है, इस तिकड़ी की बैटिंग देखने के लिए दुनियाभर के दर्शक स्टेडियम पहुंचते हैं, यह तिकड़ी है तो हमरा मिडल ऑडर मजबूत है, तमाम इस तरह के शब्द आपने न्यूज चैनलों और क्रिकेट कमेंट्री में जरूर सुना होगा. आपके दिमाग में इस वक्त यह चल रहा होगा कि आखिरकार यह तिकडी है क्या बला. ज्यादा मत सोचिए यह तिकड़ी हमारे देश के महान बल्लेबाज हैं  सचिन, द्रविड और लक्षण के नाम से मशहूर है. यह ऐसे खिलाड़ी हैं जिन्होने अपने रिकोर्ड से विश्वभर में अपनी पहचान बनाई है. संकट के समय कई बार इन्होंने टीम इंडिया को पार लगाया है. जरूरत के समय रन भी बनाए हैं और अपने दर्शकों के बीच एक आदर्श पहचान भी बनाई है.


लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि इन तिकड़ियों ने बड़ी टीमों के खिलाफ ऐसा प्रदर्शन कभी नहीं किया जिससे खुशी की अलग अनभूति होती हो. इनका प्रदर्शन भारत में ज्यादा और विदेशों में कम देखने को मिलता है. भारत के स्लो पिचों पर बल्लेबाजी करके अपने रिकोर्ड में सुधार करके भारत के दर्शक और मीडिया के सामने हिरों बन जाते हैं लेकिन उससे भारतीय टीम को कुछ खास फायदा नहीं होता. अगर हम रिकोर्ड में जाए तो भारत का मैच विनिंग प्रदर्शन विश्व की चोटी के टीमों के साथ लचर रहा है. खासकर उनकी जमीन पर तो और खराब प्रदर्शन रहा है. भारतीय टीम को बड़े अंतर से हार का सामना करना पड़ता है.


यह घर के शेर घर में ही हुंकार भर सकते हैं. विदेशी सर्जमी पर इन्हें छठी का दूध याद आ जाता है. इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि 2011 विश्व कप जिसे भारत ने अपने नाम किया था उसका सबसे ज्यादा योगदान दक्षिण एशिया की पिच का है. यहां पर पिच इस तरह से बनाई जाती है जहां पर बल्लेबाजों की बल्ले-बल्ले होती है और गेन्दबाज फिसड्डी साबित होते हैं.

विदेशों की फास्ट पिचों पर भारतीय टीम घुटने टेकते हुए नजर आती है. उस समय भारत की तिकड़ी भी मजबूर और हताश दिखाई देती है. कभी-कभी विदेशी पिचों पर देखने को मिला है कि भारत के बड़े बल्लेबाज वहां के गेंदबाजों के आगे नस्मस्तक हैं जबकी भारतीय गेंदबाज अच्छी बल्लेबाजी कर रहे होते हैं.


यहां हम केवल तिकड़ी पर पूरा का पूरा दोष थोप नहीं सकते. भारतीय हार के जिम्मेदार भारत के ऑपनर भी है. ऐसा कम ही समय आया है जहां पर इन ऑपनरों ने अच्छी शुरुआत दी हो. इनके खराब प्रदर्शन से टीम के दूसरे खिलाड़ियों पर दबाव बनना स्वभाविक हो जाता है. भारतीय क्रिकेट टीम का हार का सिलसिला इसी तरह बदस्तूर जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय टीम को एक हॉकी टीम की तरह जाना जाएगा जो अपने दर्शकों के लिए हर समय मोहताज दिखाई देती है.




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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
January 15, 2012

बहुत ही तार्किक एवं विचारणीय आलेख, समझ में नहीं आता यह तिकड़ी अब किस लये खेल रही है। क्या केवल रिकार्ड बनाने के लिये। इनकी हठ-धर्मिता की वजह से देश की अनेक प्रतिभाएं कुंठित होकर नष्ट होती जा रहीं हैं। यदि इन्होंने अति शीघ्र संयास नहीं लिया तो निश्चित ही इन्हें बेइज्जत होकर टीम से निकलना पड़ेगा। यह फैसला तो इन्हें ही करना है कि यह किस तरह की बिदाई चाहते हैं।

    shaktisingh के द्वारा
    January 16, 2012

    बहुत ही खूब कहा जनाब, इनके प्रति लोगों में चाहत धिरे-धिरे खत्म होता जा रहा है. जितना इनका अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में कद है उतना इनका प्रदर्शन नहीं है.

allrounder के द्वारा
January 7, 2012

भाई शक्तिसिंह जी, नमस्कार पहली बार आपका आलेख पढ़ा अच्छा लिखा किन्तु मैं, आपकी इस बात से बिलकुल सहमती नहीं रखता खासकर इस तिकड़ी के बारे मैं जिसका आपने जिक्र किया है, यदि आप सही से आंकड़े खंगालेंगे तो हमेशा ही इस तिकड़ी का प्रदर्शन ऑस्ट्रेलिया मैं लाजवाव रहा है ! खासकर सचिन और लक्ष्मण का इस बार जरुर द्रविड़ और लक्ष्मण अभी तक कुछ खास नहीं कर सके किन्तु सचिन वर्तमान सीरिज मैं भी रन बना रहे हैं, समस्या इस तिकड़ी की नहीं है समस्या है युवाओं की यदि ये तिकड़ी रन नहीं बना रही है तो आपके युवा गौतम गंभीर , विराट कोहली और खुद कप्तान धोनी क्या कर रहे हैं ? इस तिकड़ी का टेस्ट क्रिकेट मैं जो योगदान भारतीय क्रिकेट मैं रहा है वह अतुलनीय है, जरा सी असफलता से इन पर आरोप लगाना मेरी नजर मैं सही नहीं है ! धन्यबाद !

    shaktisingh के द्वारा
    January 9, 2012

    ऑल राउंडर जी आपको धन्यवाद कि आपने में छोटे से आलेख पर प्रतिक्रिया दी, परिवार के अंदर सबके के लिए जिम्मेदारी बटी हुई होती है लेकिन जो घर में बड़ा बुजुर्ग होता है उसके लिए जिम्मेदारी कुछ ज्यादा ही होती है. जब आप 200-250 टेस्ट मैच खेल कर कोई मैच जिताना तो दुर ड्रा तक नहीं करा पा रहे तो यह बड़े शर्म की बात लगती है.

    rahulpriyadarshi के द्वारा
    January 20, 2012

    हाँ और राहुल द्रविड़ का रिकॉर्ड भी विदेशी पिचों पर देश की अपेक्षा ज्यादा बेहतर रहा है,तीनों खिलाड़ी अपना सर्वश्रेष्ठ देने में कोई कसर नही रखते,किन्तु परिस्थितिवश मात खा जाते हैं,इन बिन्दुओं पर मैंने अपने आलेख में चर्चा भी की है,ये खिलाडी अपने रंग रूप की वजह से नही बल्कि अपने विशेष प्रदर्शनों के जरिये ही लोगों के सर आँखों पर बैठे हैं,मैं सचिन जी की टिप्पणी का भी समर्थन करता हूँ.आपकी लेखन प्रतिभा अच्छी है…लेखन में कसावट जरुर दिख रही है जो प्रभावित करती है.

mparveen के द्वारा
January 7, 2012

शक्ति जी नमस्कार, सहिया कहा आपने की तिकड़ी अब बूढी हो गई है लेकिन जवान प्लायेरों में भी दम कहाँ हैं सिर्फ वन डे और २०-२० खेल सकते हैं वो इसीलिए बूढी तिकड़ी से ही काम चलाना पड़ेगा …. सुंदर आलेख !!!

    shaktisingh के द्वारा
    January 7, 2012

    प्रवीन जी, प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, इन बूढ़े शेरों के पास 15-20 साल का अनुभव है. इनसे उम्मीदे ज्यादा हैं क्योंकि इन्ही को ही हमारी जनता ने सर आखों पर बैठाया है.

manoranjanthakur के द्वारा
January 6, 2012

सही खा सुंदर पोस्ट

    shaktisingh के द्वारा
    January 7, 2012

    मनोरंजन जी, प्रतिक्रिया देने के लिए आपको धन्यवाद 

akraktale के द्वारा
January 6, 2012

शक्ति जी सही कहा आपने कि हमारी तिकड़ी अब थकने लगी है किन्तु अब भी नए खिलाड़ियों में उतनी भी सामर्थ्य ना दिखना चिंता का विषय है.धन्यवाद.

    shaktisingh के द्वारा
    January 7, 2012

    रक्तले जी प्रतिक्रिया देने के लिए आपको धन्यवाद्,  अनुभव से लबालब भरे हमारे पुराने खिलाड़ी नए खिलाड़ी के लिए प्रेरणा का काम करते हैं. उनका अच्छा प्रदर्शन नए खिलाड़ियों पर बेहतर प्रभाव डालता है. 


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