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भारत बंद: राजनैतिक फायदा या सच्ची निष्ठा

Posted On: 31 May, 2012 Others में

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bharat bandhकेन्द्र में कांग्रेस की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार अपने पैरों पर कुल्ल्हाडी मारे जाने के लिए जानी जाती है. पहले भी इसने अन्ना हजारे और रामदेव के खिलाफ कार्यवाही करके इसकी मिशाल पेश कर दी थी. हर बार की तरह आज भी वह जनता को महंगाई के खाई में ढकेलने के लिए पेट्रोल, एलपीजी के दामों में भारी बढोत्तरी कर दी. ऐसा लगता है कि कांग्रेस का ध्येय बन चुका है कि देश की जनता को जितना हो सके उन्हे पीडा दें. उनका खून चुसने के लिए जितनी कोशिश की जा सके उतनी की जाए. जबसे इन्होंने सत्ता संभाला है खासकर यूपीए-2 ने जनहित के खिलाफ कानून और योजना बनाना, उनको हर तरफ मंहगाई और गरीबी से बांधे रखना इनका ध्येय बन चुका है.


अपने गलत नीतियों की वजह से कांग्रेस विपक्षी पार्टी को राजनीति करने का मौका दे देती है. पेट्रोल की क़ीमतों में बढ़ोतरी को लेकर विपक्षी दलों ने भारत बंद का जो आह्वान किया है इससे वह जनता की तकलीफ को कम न करके और बढ़ा रहे है. चक्का जाम से देश की आम जनता को ढेरों परेशानियों का सामना करना पड़ता है, इससे आम जनता को अपने ऑफिस जाने, कुछ जरूरी काम निपटाने, परीक्षा देने या फिर किसी गंभीर बीमारी से पीडित होने की अवस्था में हॉस्पीटल जाने संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ता है.


इस तरह के बंद से सरकार झुकने वाली नहीं है क्योंकि वह समझती है कि अगर हमने कीमतों में कटौती कर दी तो विपक्षी पार्टी इसका सारा श्रेय अपने उपर ले लेगी और जनता हमारे खिलाफ हो जाएगी. इतिहास साक्षी है कि राजनीति पार्टी के किसी भी बंद के बाद भी सरकार ने अपनी नीतियों में बदलाव नहीं किया. सरकार को पता है कि यह बंद एक दिन का है इसके बाद विपक्ष भी भूल जाएगा और जनता भी. लेकिन इस एक दिन में अगर किसी को परेशानिया उठानी पड़ती है तो वह है आम जनता. आज पक्ष और विपक्ष एक ही थाली के चट्टे बट्टे हो गए हैं. एक गलत नीतिया बनाता है और दूसरा गलत नीतियों को भुनाने के फिराक में रहता है.




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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mukesh के द्वारा
May 31, 2012

आपने पेट्रोल और अन्य जीवन उपयोगी वस्तुओ की कमरतोड़ मंहगाई पर देश की पीड़ा को सुन्दरता से व्यक्त किया है. कांग्रेस नीत सरकार आम आदमी के हित के नाम पर सत्ता में आई थी. लेकिन इसके शासन में लुटेरो के एक छोटे वर्ग को छोड़कर प्रत्येक देशवासी परेसान है. सरकार की आर्थिक नीति समझ से परे है. सबसे मुख्य बात ये सरकार देशवासियों को पुरुषार्थी नहीं, भिखारी बना कर अपना वोट बैंक बनाना चाहती है. आज देश के राजस्व का बड़ा भाग व्यर्थ की योजनाओ में बहाया जा रहा है और कर देने वालो को निचोड़ कर पंगु बनाया जा रहा है. आज आवश्यकता युवाओ को स्वरोजगार के लिए उचित वातावरण निर्माण कर के सक्छ्म बनाने की है,न की बेरोजगारी भत्ता, नरेगा, खाद्य सुरक्छा जैसे भ्रस्टाचारबढ़ने और अकर्मण्य बनाने वाली योजनाओ की. ऐसी ही योजनाओ की राशी पूर्ण करने के नाम पर पेट्रोल पर ४७%टैक्स लगा कर आम जनता पर बोझ डाला जा रहा है. मिटटी के तेल पर लाखो करोड़ की सुब्सिड़ी दी जा रही है, लेकिन इस तेल का अधिकतर भाग पेट्रोल/डीजल में मिलाने वालो के पास जा रहा है. इसीलिए अपनी नीतिओ में बदलाव की आवस्यकता है. आपने विरोधी डालो को कोसा है कि उनके बंद से जनता परेशान होती है, आप बताइए लोकतंत्र में सरकार के गलत कामो का विरोध करने का और कौन सा तरीका है ? क्या केवल मीडिया में बयान देकर जनता को उसके हाल पर छोड़ दें ? कोई विरोध न हो तो सरकार और मीडिया कहते है कि देखो लोग हमारे साथ है, कही से कोई विरोध नहीं हुआ. किसी भी आतंकी घटना के बाद अगले ही दिन जब उस स्थान के लोग अपनी आजीविका के लिए निकल जाते है, तो यही वर्ग स्थिति के सामान्य होने की बात कह कर अगली घटना की प्रतीक्छा करने लगता है. क्या किसी भी गलत काम का विरोध न करने की भावना को बढ़ा कर हम अत्याचारियो का मनोबल नहीं बढ़ा रहे है ? किसी भी समाज का विघटन अत्याचारियो के आतंक से नहीं, सज्जन शक्ति के मौन से होता है.

    shaktisingh के द्वारा
    May 31, 2012

    संविधान में जो अधिकार दिया गया वह हम सब भारतीयों एक अनमोल रत्न जैसा है. इसकी सहायता से हम सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज भी उठाते हैं. आवाज उठाने का तरीका क्या सरकारी वाहानों को जलाकर, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा, घंटो सड़को को जाम कर किया जाना चाहिए. एक तरफ तो आप कीमते कम करने की मांग करते हो दूसरी तरफ आप देश की संपत्ति को नष्ट कर उसे भारी नुकासान पहुंचाते हो. जंग अन्ना की टीम ने भी लड़ी है, मांगे उनकी भी मानी गई है भले बाद में सरकार ने धोखा दे दिया हो लेकिन उनका जंग बिलकुल ही शांतिपूर्ण लड़ा गया है.


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